राजनीतिकलेख

विकसित भारत – गारन्टी फार रोजगार एण्ड आजीविका मिशन – ग्रामीण ——एक विश्लेषण

राकेश कुमार मिश्र

संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार ने विकसित भारत – गारन्टी फार रोजगार एण्ड आजीविका मिशन -ग्रामीण ( वी बी – जी राम जी ) विधेयक पेश किया, जो विपक्ष के मुखर विरोध और लोकसभा एवं राज्यसभा में गहन परिचर्चा के बाद ध्वनमति से पारित होकर माननीय राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद अब एक कानून का रूप ले चुका है। वी बी जी राम जी कानून 2005 में लाए गए मनरेगा कानून की जगह लेगा जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार एवं आजीविका की गारन्टी के साथ विकसित भारत 2047 के विजन के अनुरूप ग्रामीण अर्थव्यवस्था का समग्र विकास करने के लिए अनिवार्य कदम उठाने पर जोर दिया गया है। सरकार का मानना है कि 20 वर्षों से चल रहा मनरेगा कानून आज की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की हकीकत से मेल नहीं खाता।पिछले दो दशकों में ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक उन्नति, गरीबी में महत्वपूर्ण कमी और बढती कनेक्टिविटी तथा डिजिटलीकरण ने भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर ही बदल दी है। इस उन्नति के बाद भी मनरेगा योजना संसाधनों के दुरूपयोग, कमजोर निगरानी एवं नियंत्रण और घटिया परिसम्पत्तियों के निर्माण जैसी ढांचागत समस्याओं से ग्रसित है। वर्ष 2024-25 में ही 193.67 करोड़ रुपये की अनियमितताएं पाई गई और मात्र 7.61प्रतिशत परिवारों को ही 100 दिनों का गारन्टीड रोजगार प्राप्त हो सका था। सरकार का प्रयास नए कानून के द्वारा इन ढांचागत विसंगतियों को दूर करना है और एक ऐसा कानून लागू करना है जो इस बिखराव वाली, गैर जवाबदेही और अपारदर्शी व्यवस्था के स्थान पर ग्रामीण रोजगार और आजीविका के लिए लक्ष्य के प्रति अधिक समर्पित, तकनीक द्वारा संचालित, जवाबदेह और पारदर्शी हो।
वी बी – जी राम जी एक केन्द्र प्रायोजित योजना होगी और सभी राज्य सरकारें कानून बनने के छः माह के भीतर तदनुसार कानून बनाएंगी जिससे इस कानून को मनरेगा की जगह लागू किया जा सके। राज्य सरकार ग्राम पंचायत, ब्लाक और जिला स्तर से योजनाओं के प्रस्तावों को समाहित करते हुए अपने प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजेंगी। इसके बाद इसे केन्द्रीय प्रायोजित योजना के रूप में लागू किया जाएगा। मनरेगा की तरह ही स्थानीय स्तर पर कार्य योजना बनाने का अधिकार विकसित ग्राम पंचायत को ही होगा जो ब्लाक और जिला स्तर से होते हुए राज्यों के पास पहुंचेगा। केन्द्र और राज्य मिलकर इन प्राप्त प्रस्तावों के आधार पर विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के तहत राष्ट्रीय नीति के अनुरूप आगे बढ़ेगे।
वी बी – जी राम जी कानून के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों के परिवारों के ऐसे व्यक्ति जो अकुशल श्रमिक के रूप में काम करने के इच्छुक हैं उन्हें पंजीकरण कराने के बाद एक वर्ष में 125 दिनों का रोजगार प्रदान करने की गारन्टी दी गई है। यह अवधि किन्हीं विशेष परिस्थितियों में ही बढ़ाने पर सरकार विचार कर सकती है। इसके पहले मनरेगा में रोजगार गारन्टी की अवधि 100 दिन थी। आदिवासी जनजाति क्षेत्रों के लिए रोजगार गारन्टी की अवधि 150 दिन थी। किसी प्राकृतिक आपदा के समय भी इसे 150 दिनों तक बढ़ाया जा सकता था।
मनरेगा का इतिहास है कि पिछले 20 वर्षों में प्रति व्यक्ति एक वर्ष में औसत रोजगार उपलब्धि 45 से 55 दिन के बीच रही है। वी बी – जी राम जी कानून में संतृप्ति आधारित डिलीवरी पर जोर दिया गया है जिसका मतलब है कि कोई भी पात्र परिवार योजना के लाभ से वंचित न रहे। सरकार का कहना है कि अन्तिम व्यक्ति तक रोजगार और आजीविका का लाभ पहुंचाना ही इस कानून का मूल लक्ष्य है। इससे श्रमिकों और भूमिहीनों की आय बढ़ेगी और उन्हें आर्थिक सुरक्षा प्राप्त होगी। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में असमानता भी घटेगी और समावेशी विकास को बल मिलेगा।
वी बी जी राम जी कानून के तहत साल में 60 दिन योजना का क्रियान्वयन स्थगित रखने का भी प्रावधान है। इसके पीछे तर्क यह है कि इस व्यवस्था से किसानों को खेती के पीक समय में श्रमिकों की कमी की समस्या से राहत मिलेगी। इसके साथ ही साथ श्रमिकों को भी अतिरिक्त कमाई का अवसर मिलेगा। इससे खेती के पीक समय कटाई, बुआई के समय श्रमिकों की कमी के कारण बढ़ती मजदूरी से उत्पन्न मंहगाई को भी नियंत्रित किया जा सकेगा।
वी बी जी राम जी योजना एवं कानून के अनुसार केन्द्र सरकार एक वर्ष के लिए राज्य सरकारों के लिए नारमेटिव आवंटन करेगी जिसका विभिन्न जिलों, ब्लाक और पंचायतों में वितरण राज्य सरकारों के द्वारा स्वीकृत योजनाओं के लिए किया जाएगा। मनरेगा के अन्तर्गत रोजगार गारन्टी की योजना एक मांग संचालित योजना थी जिसमें राज्यों के द्वारा रोजगार की मांग के अनुमान पर धन की मांग की जाती थी जिसे केन्द्र उपलब्ध कराता था। नए कानून के तहत राज्यों को बजटीय आवंटन पहले ही कर दिया जाएगा और राज्य तदनुसार रोजगार उपलब्ध कराने के लिए योजनाएं लागू कर धनराशि व्यय कर सकेंगे।अधिक व्यय किए जाने पर उसका भार राज्य सरकारों को वहन करना होगा। इस प्रकार बड़ी कुशलता एवं चतुरतापूर्ण तरीके से केन्द्र सरकार ने एक मांग संचालित योजना को पूर्ति आधारित बजटीय आवंटित योजना में परिवर्तित कर दिया है। वी बी जी राम जी योजना मनरेगा की तरह ओपन एन्डेड न होकर नारमेटिव आवंटन के आधार पर चलेगी। विपक्ष का आरोप है कि इससे राज्यों पर दबाब बढ़ेगा और संसाधनों की कमी से योजना के प्रभावपूर्ण क्रियान्वयन में दिक्कतें आएंगी। कुछ विपक्षी नेताओं का यह भी आरोप है कि यह योजना को धीरे धीरे खत्म करने की केन्द्र सरकार की साजिश है। मेरा मानना है कि इससे राज्य सरकारों की योजना लागू करने में गम्भीरता एवं जवाबदेही बढ़ाने में मदद मिलेगी और राज्य सरकारें अधिक कुशलतापूर्वक आवंटित धनराशि का उपयोग अधिकतम रोजगार सृजन के लिए करने को तत्पर होंगी।
नए कानून के तहत मनरेगा के इस प्रावधान को बरकरार रखा गया है कि पंजीकरण के पन्द्रह दिनों तक रोजगार न उपलब्ध कराने पर राज्य सरकार को पंजीकृत व्यक्ति को बेरोजगारी भत्ता देना होगा। नए कानून में यह भी प्रावधान किया गया है कि मजदूरी का भुगतान 7 दिनों में या कार्य पूरा होने के 15 दिनों के भीतर करना अनिवार्य होगा। कानून की धारा 5(3) के अन्तर्गत यह व्यवस्था की गई है कि ऐसा न करने पर क्षतिपूर्ति का भुगतान राज्य सरकारों को करना होगा।
वी बी -जी राम जी कानून के तहत सरकार ने रोजगार गारन्टी के अन्तर्गत किए जा सकने वाले कार्यों को चार प्रमुख विषयगत क्षेत्रों में रखा गया है जिनसे एक ऐसे माडल की स्थापना हो सके जो गांवों के समग्र विकास की दिशा तय कर सकें। यह चार विषयगत क्षेत्र हैं ——1.जल सुरक्षा, जल संरक्षण संरचनाएं, जल निकायों का पुनर्जीवन, भू जल पुनर्भरण, वाटर शेड एरिया का विकास एवं सिंचाई परियोजना का निर्माण जैसे जल संबंधित कार्य।
2.मूल ग्रामीण अद्योसंरचना से जुड़े कार्य जैसे सड़क, विद्यालय, सार्वजनिक भवन का निर्माण।
3. आजीविका सम्बन्धित अद्योसंरचना कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, भंडारण, बाजार, कौशल विकास से जुड़ी परिसम्पत्तियों के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका, मूल्य संवर्धन एवं आय के अवसरों में वृद्धि।
4. मौसमी आपदाओं से निपटने हेतु विशेष कार्य जैसे आश्रय स्थल एवं तटबंध निर्माण,वनाग्नि नियंत्रण, बाढ़ प्रबंधन संरचनाएं और पुनर्वास कार्य के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों को संकट से निपटने के लिए तैयार करना।
वी बी – जी राम जी कानून के अनुसार इन सभी कार्यों को विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर स्टैक में शामिल किया जाएगा। इन योजनाओं को पी एम गतिशक्ति मास्टर योजना से भी जोड़ा जाएगा जिससे सभी संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग सुनिश्चित किया जा सके और अन्तर विभागीय समाहितकरण को बढ़ावा मिले।
वी बी – जी राम जी कानून में योजना की लागत वहन करने में केन्द्र एवं राज्यों की भागीदारी 60:40 तय की गई है। पूर्वोत्तर एवं हिमालय क्षेत्र के राज्यों एवं केन्द्र शासित क्षेत्रों के लिए यह अनुपात 90:10 का होगा। गैर विधान मंडलीय केन्द्र शासित क्षेत्रों के लिए 100प्रतिशत भार केन्द्र सरकार वहन करेगी। इसके पूर्व मनरेगा में केन्द्र और राज्यों के बीच भार वहन का अनुपात 90:10 का था। केन्द्र कुल मजदूरी लागत 60प्रतिशत पूर्णतः वहन करता था जबकि 40 प्रतिशत सामग्री लागत का भी तीन चौथाई वहन करता था। संसद में परिचर्चा के दौरान अधिकांश विपक्षी नेताओं ने इस प्रावधान का मुखर विरोध किया। उनका तर्क था कि राज्यों की कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह राज्यों के साथ अन्याय है। राज्यों का कहना था कि जीएसटी लागू होने के बाद से राज्यों की आय के स्त्रोत वैसे भी बहुत सीमित रह गए हैं और राज्य अपने हिस्से की प्राप्ति के लिए भी केन्द्र पर आश्रित है। राज्यों को समय पर अपना जीएसटी का हिस्सा भी केन्द्र से नहीं मिलता और केन्द्र पर अनेक राज्यों का पैसा बकाया है। ऐसे में राज्यों पर यह अतिरिक्त बोझ डालना न केवल राज्यों के साथ अन्याय है वरन श्रमिकों के हितों के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता का भी प्रमाण है। विपक्षी नेताओं की बात में दम है कि अनेक राज्यों की आर्थिक हालत दयनीय है और वे भारी ऋण के बोझ में हैं। ऐसे में इस बात पर संदेह है कि वो किस प्रकार इस अतिरिक्त बोझ को वहन कर पायेंगे। यहाँ यह सवाल भी उठता है कि मात्र जीएसटी ही उनकी दयनीय आर्थिक स्थिति के लिए उत्तरदायी नहीं है। इन राज्यों के बेहिसाब अनुत्पादक एवं लोक लुभावने व्यय और भ्रष्ट प्रशासनिक तन्त्र भी इसके लिए काफी हद तक उत्तरदायी है। जो राज्य एवं विपक्ष के नेता आज एक महत्वपूर्ण ग्रामीण विकास एवं रोजगार सृजन की योजना पर हायतौबा कर रहे हैं, वे ही चुनाव के समय मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली राज्य के बजट पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली चुनाव जीतने के लिए योजनाओं की घोषणा में कहीं पीछे नहीं दीखते। आखिर देश के युवाओं और भूमिहीन श्रमिकों को रोजगार प्रदान करने और ग्रामीण क्षेत्रों का विकास सुनिश्चित करने के लिए राज्यों को भी आगे आने और केन्द्र के साथ मिलकर चलने में विपक्ष के नेताओं को क्या आपत्ति है। केन्द्र पर ही विकास योजनाओं के लिए शत प्रतिशत निर्भरता की सोच से कभी तो राज्यों को बाहर निकलना होगा और अपनी जिम्मेदारी का अहसास करना होगा।
वी बी – जी राम जी कानून में पारदर्शिता बढ़ाने और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए जवाबदेही तय करने पर विशेष जोर दिया गया है। इसके लिए ए आई आधारित धोखाधड़ी रोक की व्यवस्था लागू करने, बायोमेट्रिक्स वेरिफिकेशन,जीपीएस आधारित प्लानिंग, मोबाइल रिपोर्टिंग और रियल टाइम डैशबोर्ड जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग की बात कही गई है। ग्राम पंचायत स्तर पर हर सप्ताह कार्य, प्रगति और भुगतान की जानकारी सार्वजनिक करने की व्यवस्था किया जाना जरुरी होगा। साल में दो बार सोशल आडिट भी अनिवार्य होगा। इसके अलावा केन्द्र और राज्य स्तरीय स्टीयरिंग कमेटी गठित की जाएंगी जो योजना के क्रियान्वयन पर नजर रखेंगी।
वी बी – जी राम जी कानून संसद में विधेयक पेश किए जाने के समय से ही विपक्ष के निशाने पर रहा तथा इसके विरोध में सदन में परिचर्चा के दौरान और बाहर भी अनेक तर्क दिए गए। इनमें से अधिकतर तर्क राजनैतिक हैं। योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाना या मनरेगा को समाप्त करने की साजिश ऐसे ही तर्क हैं। यह समझ से परे है कि विकसित भारत के नाम से रोजगार एवं आजीविका गारन्टी योजना को महात्मा गांधी विरोधी कैसे कहा जा सकता है। यह ध्यान देने की बात है कि योजना का नामकरण देश के नाम पर है, किसी राजनेता के नाम पर नहीं है। योजना के संक्षिप्त नाम में राम ढूंढना और भी हास्यास्पद है। ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज्य मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने सदन में योजना पर परिचर्चा का जवाब देते हुए सही ही कहा कि महात्मा गांधी के नाम हटाने के नाम पर हल्ला वो लोग मचा रहे हैं जिन्होंने देश में 450 से अधिक योजनाओं, संस्थानों,हवाई अड्डों, सड़कों और पुरस्कारों के नाम नेहरू एवं तथाकथित गांधी परिवार के नाम पर रखे। तब इनको एक परिवार छोड़कर कभी भी राष्ट्रपिता या देश के लिए शहादत देने वाले क्रांतिकारियों एवं स्वतंत्रता सेनानियों की याद भी नहीं आई। मनरेगा में भी महात्मा गांधी का नाम 2009 में आम चुनाव के समय जोड़ा गया। इसके पहले योजना का नाम नरेगा था और उससे पहले जवाहर रोजगार योजना।
इसी तरह यह भी समझ से परे है कि जब सरकार रोजगार गारन्टी योजना को विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के अनुरूप ग्रामीण विकास सुनिश्चित करने के साथ साथ अधिक पारदर्शी और जवाबदेह रूप में लागू कर रही है तो फिर मनरेगा को खत्म करने और सरकार को श्रमिक एवं भूमिहीनों का विरोधी कहना कहाँ तक उचित है।
कांग्रेस अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी कहा कि नया विधेयक मनरेगा को योजनाबद्ध तरीके से खत्म करने की साजिश है। श्रीमती प्रियंका गांधी ने कहा कि यह बार बार नाम बदलने की इस सरकार की नीति समझ से परे है, इससे जनता के लाखों करोड़ रुपये की बरबादी होती है। वह यह बात भूल गई कि उनकी दादी के समय से ही गरीबी निवारण और रोजगार सृजन के लिए जितने कार्यक्रम नाम बदल बदलकर चलाए गए उनकी क्रमवार गिनती भी कठिन है। जब सरकार 20 वर्षों के बाद किसी योजना में ढांचागत सुधार करके उसे नए ग्रामीण भारत की जरूरत के तदनुरुप लाना चाहती है, तो फिर नाम बदलने पर इतने सवाल क्यों?
सीपीएम के सांसद जाँन ब्रिटास ने कहा कि नए कानून में पंचायतों को दरकिनार करके केन्द्रीय डैशबोर्ड को मजबूत बनाया गया है क्योंकि योजनाओं की प्राथमिकता और अन्तिम निर्णय केन्द्र लेगा जबकि मनरेगा में यह निर्णय पंचायतें स्थानीय जरूरत के आधार पर लेती थीं। इस विषय में यही कहा जा सकता है कि नए कानून में भी प्रस्तावों को तैयार करने का अधिकार विकसित ग्राम पंचायत के ही पास है जिसे वे ब्लाक और जिला स्तर के माध्यम से राज्य सरकार को भेजेंगी। राज्य सरकारें केन्द्र के साथ मिलकर इन्हें राष्ट्रीय नीति के अनुरूप लागू करेंगी। इससे योजनाओं में बिखराव पर अंकुश लगेगा और उन्हें अधिक प्रभावी और राष्ट्रीय फ्रेमवर्क में लागू किया जा सकेगा।
राज्यों पर योजना के लागू करने के लिए बढ़ने वाले वित्तीय बोझ का सवाल सदन में परिचर्चा के दौरान छाया रहा। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि राज्यों को वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ेगा और अधिक अनुशासन के साथ साथ व्यय करने की नीति पर चलना होगा। कुछ विपक्षी नेताओं के द्वारा नए कानून को संघीय व्यवस्था पर प्रहार तक कहा गया।यह भी एक राजनैतिक आरोप ही अधिक है। हमने देखा कि योजनाओं के बनाने और उन्हें लागू करने में राज्य सरकारों की अहम भूमिका है। केन्द्र का काम राज्यों के बीच धनराशि का देश की प्राथमिकताओं के आधार पर आवंटन तथा राज्य सरकारों के साथ मिलकर योजना के प्रभावपूर्ण क्रियान्वयन के लिए नियंत्रण की व्यवस्था करना है। ऐसे में यह कहना गलत होगा कि नए रोजगार गारन्टी कानून के द्वारा राज्यों के अधिकारों को सीमित किया गया है और संघवाद पर चोट की गई है।
अन्त में हम यही कह सकते हैं कि मनरेगा के स्थान पर नया रोजगार गारन्टी कानून समय की जरूरत थी और ऐसा करके सरकार ने एक अच्छा प्रयास किया है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि वी बी – जी राम जी कानून मजदूरों की आय बढ़ाने और उनको आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के साथ साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ एवं विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के अनुरूप बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। हम यह भी उम्मीद कर सकते हैं कि नई तकनीक आधारित व्यवस्थाएं लागू होने से योजना का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो सकेगा और पारदर्शिता में वृद्धि होगी।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button