सनातन में मानव कल्याण की कामना, गोरक्षपीठाधीश्वर के रूप में योगी आदित्यनाथ का सनातन पर गहन व्याख्यान, मुख्यमंत्री के रूप में सरकार की उपलब्धियों का उल्लेख
डॉ दिलीप अग्निहोत्री

सनातन संस्कृति में मानव मात्र के कल्याण की कामना की गई। इसमें जीव जंतु और प्रकृति अभी के संरक्षण का विचार समाहित है। उपासना पद्धति के आधार पर भेदभाव को मान्यता नहीं दी गई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गौतमबुद्धनगर में आयोजित नारी सम्मान,युवा स्वाभिमान पर केन्द्रित प्रेरणा विमर्श में इन तथ्यों का उल्लेख किया। ऐसा प्रतीत हुआ कि वह गोरक्षपीठाधीश्वर के रूप में यहां व्याख्यान दे रहे हैं। धर्म संस्कृति की उन्होंने गहन व्याख्या की। वर्तमान में इस भाव की प्रासंगिकता का निरूपण किया। उन्होंने कहा,,
ऋषि परम्परा को समझने के लिए उसके मूल मंत्रों और जीवन-दर्शन को समझना आवश्यक है।
भारत की आत्मा सनातन है।
सनातन का मूल भाव किसी व्यक्ति, पंथ,सम्प्रदाय या क्षेत्र तक सीमित नहीं है।
‘आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः’ अर्थात दुनिया की सभी दिशाओं से हमारे पास श्रेष्ठ और कल्याणकारी विचार आएं।
भारत ने दुनिया को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दिया। हमारी संस्कृति में कहा गया ‘अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात यह अपना है और यह पराया है, ऐसी गणना छोटे मन वाले करते हैं। उदार चरित्र वालों के लिए पूरी पृथ्वी ही परिवार है। यही भारतीय दृष्टि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के रूप में दिखाई देती है।
भारतीय दर्शन का विस्तार इतना व्यापक है कि यहां ‘एकम् सत्य विप्रा बहुधा वदन्ति’ कहा गया।
‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ अर्थात पृथ्वी हमारी माता है और हम सब उसके पुत्र हैं।
समत्वं योग उच्यते’ कहा गया है अर्थात समभाव ही योग है।
भगवान बुद्ध ने ‘अप्प दीपो भव’ का संदेश दिया।
भगवान श्रीकृष्ण के संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे’।
भारत की युवा पीढ़ी को अपने देश, अपनी संस्कृति और अपने महापुरुषों के प्रति गौरव की भावना के साथ आधुनिक ज्ञान और तकनीक से भी जुड़ना होगा।
इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने सरकार की उपलब्धियों का भी उल्लेख किया।



